Universal Principles Chart Explanation is given below.
इस ब्रम्हाण्डीय विधान चार्ट की व्याख्या नीचे दिया गया है !



सम्पूर्ण को सम्पूर्णतया जनाने वाला उपर्युक्त ब्रम्हाण्डीय विधान वाले चार्ट में सम्पूर्ण को कुल चार क्षेत्रों में विभाजित हुआ दिखाया गया है जो इस प्रकार हैं--
The above chart has been shown in four parts of all the zones of the Universe including that of Khuda-GOD-Bhagwan-Sat SiriAkaal.

1.From World to body
(संसार से शरीर तक)
यह पहला क्षेत्र है जो संसार-परिवार और शरीर तक सीमित है । इस क्षेत्र के विषय-वस्तुओं को जानने और उनका लाभ पाने के लिये 'शिक्षा' नामक विधान से गुजरना पड़ता है । इस क्षेत्र की सारी उपलब्धियां शरीर से शरीर तक और शरीर के लिये ही हैं । शरीर के छूटते ही इस क्षेत्र की सभी उपलब्धियां समाप्त हो जाती हैं । This is the first field which is limited upto world, family and body. To know and to get the benefit of the objects of this sphere, one has to pass through the system, namely 'Education'. All the achievements of this sphere are by the body, for the body and of the body. On casting off the body, all is lost.
2. From the body and upto the Self
(शरीर से आगे जीव तक)
यह क्षेत्र शरीर से आगे और जीव तक होती है । 'स्वाध्याय' नामक विधान से इस क्षेत्र को प्रायौगिक रूप से जाना और देखा जाता है और इस क्षेत्र से लाभान्वित हुआ जाता है । इस क्षेत्र की उपलब्धियां पहले क्षेत्र के उपलब्धियों से अति श्रेष्ठ होती हैं किन्तु ये उपलब्धियां भी स्थाई रूप से नहीं होती हैं । अभ्यास की आवश्यकता है । आनन्द इस क्षेत्र क़ी अधिकतम उपलब्धि है । इस क्षेत्र के लिये सूक्ष्म दृष्टि की आवश्यकता है जो सच्चे गुरु या सद्गुरु से प्राप्त होती है । This region is beyond the body and upto the Self. It is 'Self Realization' (Swaddhyaya) through which all is known and seen practically and got benefitted in and with this region. The achievements of this sphere are better than those of the earlier one but they are also not stable. Practice is imperative. Pleasure (without peace) is the utmost achievement in this sphere. For this region, Sceptal Eye is necessary to get from Real Sadguru so as to see every thing of this region.
3. From the Selfand upto the Soul
(जीव से आगे ईश्वर तक)
यह क्षेत्र जीव से आगे और ईश्वर या आत्मा या ब्रम्ह या नूर या सोल तक होती है । 'योग-साधना या अध्यात्म' नामक विधान से इस क्षेत्र को प्रायौगिक रूप से जाना और साक्षात् देखा जाता है । दिव्य उपलब्धियों, दिव्यानन्द या ब्रम्हानन्द या चिदानन्द को पाने के लिये और आत्मा-ईश्वर-ब्रम्ह से जुड़ने के लिये दिव्य दृष्टि की आवश्यकता होती है जो सद्गुरु से प्राप्त होती है । किन्तु इस क्षेत्र में भी मुक्ति-अमरता देने की क्षमता नहीं होती है । इसलिये मोक्ष का सच्चा जिज्ञासु इस क्षेत्र में कोई रुचि नहीं रखता । यह क्षेत्र जीव से आगे और ईश्वर या आत्मा या ब्रम्ह या नूर या सोल तक होती है । 'योग-साधना या अध्यात्म' नामक विधान से इस क्षेत्र को प्रायौगिक रूप से जाना और साक्षात् देखा जाता है । दिव्य उपलब्धियों, दिव्यानन्द या ब्रम्हानन्द या चिदानन्द को पाने के लिये और आत्मा-ईश्वर-ब्रम्ह से जुड़ने के लिये दिव्य दृष्टि की आवश्यकता होती है जो सद्गुरु से प्राप्त होती है । किन्तु इस क्षेत्र में भी मुक्ति-अमरता देने की क्षमता नहीं होती है । इसलिये मोक्ष का सच्चा जिज्ञासु इस क्षेत्र में कोई रुचि नहीं रखता ।
4. From the Soul and upto the GOD
(ईश्वर से आगे परमेश्वर तक)
यही वह क्षेत्र है जिसे सम्पूर्ण कहा जाता है । ज्ञान दृष्टि इस क्षेत्र का मूल है । आत्मा या ईश्वर या ब्रम्ह या नूर या सोल के आगे परमात्मा या परमेश्वर या परमब्रम्ह या अल्लाहतआला या गॉड तक एवं सम्पूर्ण की सम्पूर्णतया जानकारी एवं साक्षात् दर्शन इसी विधान में उपलब्ध होता है । सच्चिदानन्द इस क्षेत्र की अन्तिम उपलब्धि है। मुक्ति और अमरता इसी विधान के अन्तर्गत मिलती है । परमेश्वर ही इसका सर्वे सर्वा है । तत्तवज्ञान उसका अपना निज विधान है । This is the sphere which is called 'Perfect'. Supremely Eye is the root of this level. Beyond Aatma or Eeshwar or Bramha or Soul and upto Partmatma or Parmeshwar or Parambramha or GOD or Allaahtaala and all the perfect are known and seen practically in one's front in this very system. Eternal Bliss (Eternal peace and pleasure) is the utimate achievement of this sphere. Liberation and Immortality can be had in this System only. GOD is all-in-all at this sphere. Tattvagyan is His own system.
Conclusion:
उपसंहार :
वास्तव में परमाणु से लेकर परमेश्वर तक के बीच सम्पूर्ण अस्तित्त्व को यदि श्रेणीबध्दता के क्रम में रखा जाय तो जानने-देखने में पांच श्रेणियों में सम्पूर्ण स्थित है---

1. संसार-खिलकत-वर्ल्ड; 2. शरीर-जिस्म-बॉडी; 3. जीव-रूह-सेल्फ; 4. आत्मा-ईश्वर-ब्रम्ह-नूर-सोल-स्पिरिट-शिव 5. परमात्मा-परमेश्वर-परमब्रम्ह-खुदा-गॉड-भगवान् ।

इन उपर्युक्त पांचों में से

(1) संसार और (2) शरीर दोनों ही स्थूल श्रेणी में (3) सूक्ष्म श्रेणी में (4) कारण श्रेणी में और (5) परमकारण (महाकारण) श्रेणी में ही

इन उपर्युक्त चारों श्रेणियों में रहने वाले की पृथक्-पृथक् रूप में यथार्थत: जानकारी और प्राप्ति हेतु इनकी अपनी-अपनी जानकारियां भी चार श्रेणियों में ही हैं। जैसे--

1 स्थूल जगत् सहित शरीर की यथार्थत: जानकारी और प्राप्ति हेतु शिक्षा (Education) है;

2 सूक्ष्म शरीर (Sceptal Body) की यथार्थत: जानकारी और प्राप्ति हेतु स्वाध्याय (Self Realization) है;

3 कारण शरीर (Causal Body) की यथार्थत: जानकारी और प्राप्ति हेतु योग-साधना अथवा अध्यात्म (Spiritualization) है और

4 परमकारण (महाकारण) की यथार्थत: जानकारी और प्राप्ति हेतु तत्त्वज्ञान रूप भगवद्ज्ञान रूप सत्यज्ञान रूप परमज्ञान रूप सम्पूर्ण ज्ञान रूप अशेष ज्ञान (ये सभी उपाधियां एक ही तत्त्वज्ञान रूप KNOWLEDGE की ही ।) हैं ।

सारी सृष्टि अथवा सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड में उपर्युक्त चार प्रकार (श्रेणियों) का अस्तित्त्व-स्थिति और चार प्रकार (श्रेणियों) में जानकारियां हैं । नि:संदेह इसके बाहर कहीं कुछ भी नहीं है।
यह बात सत्य है-- बिल्कुल ही सत्य है कि उपर्युक्त क्रमश: तीन श्रेणियों में ही सारी सृष्टि अथवा सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड का अस्तित्व (स्थिति) और जानकारियां होती रहती हैं। चौथी श्रेणी वाला अस्तित्व और जानकारी सृष्टि अथवा ब्रम्हाण्ड में रहती ही नहीं । केवल अवतार बेला में जबकि चौथी श्रेणी वाला परमकारण रूप खुदा-गॉड-भगवान् बिहिश्त-पैराडाइज-परमधाम से भू-मण्डल पर अवतरित (INCARNATE) होता है । तब उसी के साथ ही उससे सम्बन्धित चौथी श्रेणी वाला तत्त्वज्ञान (KNOWLEDGE) भी उन्हीं के द्वारा प्रकट होता है । खुदा-गॉड-भगवान् के अवतार के वगैर कोई भी धरती का हो अथवा देवलोक तक का ही क्यों न हो, तत्त्वज्ञान (KNOWLEDGE) रूप सत्यज्ञान की यथार्थत: वास्तविक जानकारी न तो दे सकता है और न तो पा ही सकता है । यह सुनिश्चित सत्य पर आधारित तथ्य है जो सद्ग्रन्थीय सत्प्रमाणों से प्रमाणित भी है।
If all the existences lying between atom and Almighty are arranged in a sequential form, they are found in Five main Categories.

1. World-Sansaar-Khilqat 2. Body-Shareer-Zism 3. Self-Rooh-Jeeva 4. Soul-Aatma-Eeshwar-Bramha-Noor-Spirit-Shiv and 5. GOD-Parmatma-Parmeshwar- Parambramha- Khuda-Bhagwan.

Of the above five, the first and the second lie under the category of 'Sthool' or 'Grossly'. The third under 'Sookshma' or 'Sceptal'. The forth under 'Causal' or 'Divine'. And the last one lies under the Supreme Category namely 'Absolute Causal' or 'Eternal'.

There are also Four respective Categories for knowing and gaining all the Four levels separately.

1. To know about the Body with gross world -- by Education or Shiksha;

2. To know the Self or Sceptal Body as-it-is -- by Self Realization or Swadhyaya;

3. To know the Soul or the Divine Causal body -- by Spiritualization or Yoga or Addhyatma and

4. To know and gain the Eternal Causal Entity or Khuda-GOD-Bhagwan -- by Tattvagyan like True Knowledge or Param Knowledge.

In the entire Universe, there are Four stages and Four Systems of Knowledge. Nothing remains out of these. This is completely True that the whole universe lie in the above Three categories and fourth one is always beyond the universe excepting when Khuda-GOD-Bhgwan of the Fourth Category incarnates down onto this earth from His Eternal Abode or Paramdham. Then the Fourth System comes down alongwith Him. None of this world or of Sceptal World of deities even, except GOD can impart Tattvagyan in a real sense which comes at the Fourth Category and none can achieve It also. This is a certain Truth and based on facts from ashrams.

Sant Gyaneshwar Swami Sadanandji Paramhans

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