वास्तविकता

सर्वप्रथम में 'आत्मतत्त्वम्' था शब्द रूप में एक ।
उसी 'तत्त्व' के कृत संकल्प से सृष्टि भई अनेक ॥
'परमतत्त्वम्' से आत्म निकल फिर लिया चेतन रूप ।
उसी आत्म से सृष्टि भई यह जड़ चेतन भवरूप ॥
'आत्मतत्त्वम्' अद्वैत् रूप था, अद्वैत् का ही खेल यह।
धर्म-कर्म और कर्म-धर्म का विचित्र रचाया मेल वह॥
'तत्त्व' से आत्म, आत्म ही चेतन, चेतन से जड़ रूप।
चेतन-आत्म निकल 'तत्त्व' से लिया प्रचण्ड ज्योतिर्मय रूप ॥
ब्रह्म-ज्योति और दिव्य-ज्योति, सब आत्मा का ही रूप ।
ज्योति मात्र को 'तत्त्व' न मानो, ज्योति से श्रेष्ठ 'तत्त्व' को जानो।
'तत्त्व' से आत्म, आत्म से हँ इन तीनों को पहचानो ॥
'तत्त्व' एक है ज्योति अनेक, हँ तो भया हर तन का टेक ॥
तन से पृथक् हँ को मानो, हँ से पृथक् स: को जानो ।
हँऽस जीवात्मा से पृथक् उस 'आत्मतत्त्वम्' को पहचानो ॥
तन है देह, जीव है हँ, हँऽस का पतन रूप है सोऽहँ ।
आत्मा का ही गुण दोषमय रूप हुआ है हँ ॥
हँ को कायम रखने हेतु ही आता 'तत्त्व' से स: ।
स: ही हँ पतितमय सोऽहँ, उर्ध्वमुखी क्रिया है हँऽस ॥
सोऽहँ रूप है आत्मा जीवमय, हँऽसो है जीवात्मा ।
सोऽहँ-हँऽस से पृथक् 'तत्त्व' है 'आत्मतत्त्वम्' परमात्मा ॥
आत्म-ज्योति ही तन-प्रवेश कर हो जाता हँ रूप ।
आत्म-ज्योति जैसा ही स: भी होता रहता है हँ रूप ॥
सोऽहँमय सब प्राणी मात्र हैं, हँऽसोमय योगी साधक ।
जो कोई कहता दोनों एक हैं, वह है योग अध्यात्म का बाधक॥
सोऽहँ स: का पतन रूप है, हँऽस है हँ का ही स: रूप ।
'आत्मतत्त्वम्' तो सोऽहँ-हँऽस का उद्गम-विलय रूप-अनूप ॥

पूरी धरती पर क्या कोई भी ऐसा है जो इस उपर्युक्त ''वास्तविकता'' को सद्ग्रन्थीय और प्रायौगिक आधार पर भी ग़लत प्रमाणित करने की चुनौती दे सके ? जबकि मैं किसी भी गुरु-तथाकथित सद्गुरु-तथाकथित भगवानों आदि धर्मोपदेशकगण, यदि वे तैयार हों अथवा मेरी चुनौती स्वीकार करें तो उनके दीक्षा-उपदेश-सिध्दान्त को सद्ग्रन्थीय सत्प्रमाणों और प्रायौगिक आधार पर भी ग.लत अथवा आध-अधूरा प्रमाणित करने को तैयार हूँ । यह मात्र कथन की ही बात नहीं अपितु एक चुनौती भरा सत्य तथ्य है। इसे मेरी महत्तवाकाँक्षा अथवा मेरा अहंकार न समझा जाय बल्कि भगवत् कृपा अथवा तत्त्वज्ञान के प्रभाव के आधार पर ही समझें। सच्चाई को जानें-देखें- समझें-परखें और सही ही मिले तो अपनाकर लाभान्वित अवश्य ही हों। यह ही जीवन का उद्देश्य है ।

सब भगवत कृपा से ।
तत्त्ववेत्ता परमपूज्य सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस

'पुरुषोत्तम धाम आश्रम'
पुरुषोत्तम नगर- सिध्दौर, बाराबंकी-225 413 उ0 प्र0


तत्त्ववेत्ता परमपूज्य सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस
प्रेम से बोलिये -- श्रीसद्गुरुदेव महाराज की -- जय !
परमपिता परमेश्वर की -- जय !!
आनन्दकन्द लीलाबिहारी प्रभु सदानन्द मनमोहन भगवान् की--जय !!!

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